Wednesday, June 20, 2012

अदाएँ ...


खुदा जानता है या फिर तुम, गहराई प्यार की 
वर्ना, सुनते तो यही हैं कि बहुत डूबते डूबते बचे हैं ?
... 
अब तू खामों-खां इल्जाम मत लगा 
आँखों से, छेड़-छाड़ होती है कभी ? 
... 
क़त्ल हो जाए और आह भी न निकले 
कुछ ऐंसी हैं 'उदय', ... अदाएँ उसकी !

2 comments:

परमजीत सिहँ बाली said...

badhiyaa!!

एक सैलानी said...

सुंदर रचना एवं अभिव्यक्ति  "सैलानी की कलम से" ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा है।