Friday, June 8, 2012

अंदेशा ...


अब उनसे दौड़, अपनी कब रही थी 'उदय' 
जिन्होंने जीत के तमगों में गड्ड-मड्ड कर लिया था ? 
... 
उफ़ ! हुआ वही, जिसका अंदेशा था 'उदय' 
लोगों ने, खुद को 'खुदा' कहना शुरू कर दिया है ?
... 
बुझते-बुझते फिर भभक उठता हूँ 
बस, तेरी फूंक में जोर इत्ता ही है ?

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

फूँक में दम है..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!