Monday, May 28, 2012

कलम के देवता ...


उनकी जरूरतों ने, हमें उनका बाप बनाया था 'उदय' 
अब, जब जरूरतें नहीं हैं, तो वो हमें पहचानते नहीं !
... 
चरणों में दंडवत तो हजारों की फ़ौज है 'उदय' 
पर लगता नहीं, कोई तूफानों में संग नजर आए ? 
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दोस्तों में, दबी मायूसी देख के, यकीं है 'उदय' 
कि - कदम हमारे सही राह पर हैं !
... 
दौर-ए-बुराई तो गुजर जाना है 'उदय' 
पर, क्या खोया - क्या पाया, कशमकश कायम रहेगी !
... 
सच ! गर मर्जी होगी 'सांई' की, तो तय है 'उदय' 
किसी दिन, महसूस कर लेंगे खुशबू गुलाब की !!
... 
कलम मेरी 'उदय', उन मगरुरों के लिए नहीं चलती 
सच ! जो, खुद को कलम के देवता समझते हैं !!
... 
तेरे आदाब का ढंग, किसी सजदे से कम नहीं है दोस्त 
चाहकर - न चाहकर भी, तू मुझे अपना बना लेता है ! 

1 comment:

प्रतीक माहेश्वरी said...

कलम मेरी 'उदय', उन मगरुरों के लिए नहीं चलती
सच ! जो, खुद को कलम के देवता समझते हैं !!

क्या खूब! क्या खूब! :)