Thursday, April 5, 2012

बुराई ...

तेरे अल्फाजों में साफगोई नजर नहीं आ रही है दोस्त
तू तारीफ़ में है, या नाराजगी है !!
...
शायद, कहीं कुछ थी बुराई, अन्दर ही मेरे
मैं अच्छा करता रहा, और बुरा होता रहा !
...
आज फिर सारे दिन 'उदय', हम इंतज़ार करते रहे उनका
सच ! कुसूर अपना ही था, जो झूठों पे एतबार था हमको !!

5 comments:

अरूण साथी said...

तारीफ ही है जी, आप तो खामखा नाराजगी समझ बैठे....सुन्दर।

प्रतीक माहेश्वरी said...

पहली और दूसरी सूक्तियां बेहतरीन! मज़ा आ गया..

Ratan singh shekhawat said...

बहुत खूब

Ratan singh shekhawat said...
This comment has been removed by the author.
प्रवीण पाण्डेय said...

चेहरा कहाँ सब समझ पाते हैं।