Wednesday, January 11, 2012

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का ...

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का
भला क्यूँ, अब मुझे तू आजमाना चाहता है !

क्या मिलेगा अब, बन के अंधड़ किसी को
अब कहाँ तिनका रहा मैं, जो तू उड़ाना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं सारे जहां का
क्या मिलेगा अब तुझे, जो तू मेरा होना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं खारा समंदर
भला क्यूँ, अब मुझमें तू डुबकी लगाना चाहता है !

हो गया हूँ अब मैं वटवृक्ष यारा
भला क्यूँ, अब मुझे तू बहारों की कहानी सुनाना चाहता है !

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का
भला क्यूँ, अब मुझे तू आजमाना चाहता है !!

4 comments:

Rahul said...

क्या मिलेगा अब, बन के अंधड़ किसी को
अब कहाँ तिनका रहा मैं, जो तू मुझको उड़ाना चाहता है !

Very nice

प्रवीण पाण्डेय said...

और भला क्या शेष रहा अब..

Dr.J.P.Tiwari said...

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का
भला क्यूँ, अब मुझे तू आजमाना चाहता है !

क्या मिलेगा अब, बन के अंधड़ किसी को
अब कहाँ तिनका रहा मैं,जो तू मुझको उड़ाना चाहता है !

स्वरों में इतनी निराशा और अवसाद क्यों है? पत्थर को भी पिघला देने का सामर्थ्य है इस रचना में. इतना करुण न लिखो भाई. पढ़ के आती है रुलाई.

***Punam*** said...

हो गया हूँ मोम से पत्थर कभी का
भला क्यूँ, अब मुझे तू आजमाना चाहता है !!


खूबसूरत....

मोम को न जाने क्यूँ पत्थर बनाने में लगे रहते हैं
और फिर उम्मीद करते हैं वापस मोम हो जाने की