Friday, January 20, 2012

बूढा ... कब तक ?

बूढा, एक बेसहारा ...
जाए तो जाए कहाँ ?
न घर, न कोई द्वार !
सड़क के किनारे
चाय की दुकान के
बुझ-से चुके चूल्हे के पास
कहीं दबे -
किसी अंगार की आंच -
की उम्मीद में ...
सामने, ज़मीन पर
सिकुड़ के सो गया है !
लगता है, आज की रात
बूढ़े की उम्मीद
कड़-कडाती ठंड से -
फिर से जीत जायेगी !
और
वह सुबह उठकर
एक और -
नया सवेरा देखेगा !
लेकिन -
इस तरह, कब तक ?

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

हर रातों में धुंध भरी है,
नहीं सूझता,
क्या होगा,
इस रात के बाद..

अरूण साथी said...

एक यथार्थ,