Tuesday, January 17, 2012

.. ये राजनैतिक पेंच हैं !

बड़ा मुश्किल सफ़र है, आज का ये दिन मेरे यारा
किसी ने कह दिया है, मुझे तुम सांथ ही रखना !
...
जिनके पांव, घर-आँगन से बाहर नहीं पड़ते
उन्हें कैसे खबर हो, शहर में मेला लगा है !
...
लड़ रहे हैं, अड़ रहे हैं, भिड़ रहे हैं
पर शान से सब चल रहे हैं !
...
जिस तरफ सिक्के गिरें, नेता वहां मौजूद हैं
ये राजनैतिक दांव हैं, ये राजनैतिक पेंच हैं !!
...
आज की सब, शीत की लहरें नहीं हैं
गुन-गुनी धूप संग, है बिखरा सवेरा !

2 comments:

परमजीत सिँह बाली said...

sunder rachanaa hai.

प्रवीण पाण्डेय said...

धूप गुनगुनी,
कष्ट में कमी।