Sunday, December 11, 2011

साहित्यिक बाबा ...

अरे भाई
वे किसी 'बाबा' से कम नहीं हैं !
उनके इर्द-गिर्द
दो-चार चेले-चपाटे रहते ही हैं
जो हर समय -
उनकी जय जयकार करते हैं !

उनके माथे पर -
'मठनुमा' एक टीका भी लगा रहता है
गले में पुरुष्कार रूपी -
तीन-चार मालाएं भी लटकी रहती हैं !

और तो और
उनके काँधे पे लटके झोले में -
चार-पांच प्रकार की भभूतियाँ भी रखी होती हैं
जिन्हें वे अक्सर -
नए चेले बनाने में प्रयोग में लाते हैं !

वे कितने -
ढोंगी, पाखंडी हैं, ये तो मैं नहीं कह सकता !
पर हाँ, इतना जरुर है
कि -
वे इस युग के 'साहित्यिक बाबा' हैं !

वे किसी को भी -
न सिर्फ पुरुष्कार रूपी वरदान दे सकते हैं
वरन -
रातों-रात पुरुष्कृत भी कर सकते हैं !
वे असीम शक्तियों वाले 'साहित्यिक बाबा' हैं
उनकी ... चहूँ ओर जय जयकार है !!

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

राजनीति का कुछ तो असर पड़ेगा ही

Pallavi said...

सनगटी का प्रभाव भी हो सकता है :)
समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका सवागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/12/blog-post_12.html

http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_11.html

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|