Tuesday, December 6, 2011

अंगार ...

जिंदगी-नुमा
चिलचिलाती धूप में !
इंसान -
लू की तेज लपटों में
चलते चलते
न जाने कब, कैसे
खुद ही
अंगार बन जाता है !
और -
खुद ही जलता है
खुद ही तपता है
खुद ही सहता है
फिर भी -
अनजानी राहों पे
धीरे धीरे -
आगे बढ़ते रहता है ... !!

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

इस गर्मी में जो हवा बहेगी, लू बन जायेगी।

Pallavi said...

saty vachan ...)समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है