Saturday, September 10, 2011

जज्बात ...

तुम
जब जब आते हो
सामने मेरे
मैं खोल देती हूँ
खोल कर रख देती हूँ
सब कुछ, ताकि, तुम्हें
दिक्कत न हो
देखने
, समझने में !

मैं
यह भी नहीं चाहती
कि -
तुम्हें, ज़रा भी संकोच हो
मुझे, समझने में
इसलिए
कुछ छिपाती नहीं हूँ
अब, छिपाऊँ भी
तो, क्या छिपाऊँ, तुमसे
जो है, जैसा है
सब का सब सामने है !

तुम चाहो तो
देखकर
छूकर
पढ़कर
डूबकर
टटोल कर,
उलट-पलट कर
जान लो, समझ लो
मेरे जज्बात ...
फिर, मत कहना
कि -
छिपाए थे
जज्बात ...
मैंने ... तुमसे !!

5 comments:

vipin sethi said...

बहुत बढिया उदय जी

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति| धन्यवाद|

सागर said...

bhaut hi khubsurat bhaavabhivaykti....

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी सुन्दर पंक्तियाँ।

वन्दना said...

VAH.....KHULI KITAB HUN JO CHAHE PADH LENA MAGAR NA KABHI SHIKAYAT KARNA.