Friday, September 16, 2011

... कल उधर का हो जाऊंगा !!

उफ़ ! हम अपना मर्ज उन्हीं से छिपाते फिरे
जिनके छूने का असर, दवा से बेहतर निकला !
...
सच ! मसीहा हो चले हैं वो, जो आग में कूदे हुए हैं
जिन्हें परवा हुई, आज की, कल की, साक्षी हुए हैं !
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ये कैसा वक्त मुक़र्रर हुआ है 'उदय'
शेर, शेर को दाद दे रहा है !
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कदम लम्बे, सफ़र छोटा हुआ है
मसीहों की किताबों में शिकवे नहीं होते !
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चाँद-तारों, जमीं-आसमां, में नहीं था
मैं कुछ तो था मगर, कुछ भी नहीं था !
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कहाँ मर्जी हमारी, कहाँ अपना ठिकाना
जिधर बोलो उधर, बना लें आशियाना !
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मैं खुद का भी नहीं हूँ, क्यूं मुझसे मेरा पता पूंछते हो
सच ! आज इधर हूँ, तो कल उधर का हो जाऊंगा !!
...
लो पास होते होते, हम फिर से फ़ैल हो गए
अभी मालुम पडा कि - वो गुलामी पसंद हैं !
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जय हो ! कभी कुछ और थे, आज कुछ और हैं
समय समय की बात है, समय समय के फेर हैं !
...
न कायर, न शायर, न माशूक, न मुहब्बत
सच ! क्यूं न दो घड़ी बैठ के बातें कर लें !!

2 comments:

vipin sethi said...

हम अपना मर्ज उन्हीं से छिपाते फिरे
जिनके छूने का असर, दवा से बेहतर निकला !

bahut badia uday jee

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब।