Monday, August 29, 2011

जद्दो-जहद !

मोहब्बत में, वादों में, सच्चाई में
दिल, दिमाग को, आपस में जद्दो-जहद करते देखा है !

जिन्दगी में, जिन्दगी से, जिन्दगी को
रूठते-मनाते, रोते-हंसते, पल-पल आगे बढ़ते देखा है !

सत्ता के गलियारों से साहित्यिक चौपालों तक
छल, कपट, प्रपंचरूपी मुखौटों को आगे बढ़ते देखा है !

नहीं था रंज, हार-जीत का हमें
भेद-भाव के बीच भी, इरादों को आगे बढ़ते देखा है !

तंग, मुश्किल, परेशां, घड़ी में भी
हमने खुद को, कदम-दर-कदम आगे बढ़ते देखा है !!

5 comments:

Suresh kumar said...

जिन्दगी में, जिन्दगी से, जिन्दगी को
रूठते-मनाते, रोते-हंसते, पल-पल आगे बढ़ते देखा है !
बहुत सुन्दर रचना .....

सागर said...

sundar prstuti....

प्रवीण पाण्डेय said...

बस बढ़ते जाना है।

अशोक बजाज said...

नहीं था रंज, हार-जीत का हमें
भेद-भाव के बीच भी, इरादों को आगे बढ़ते देखा है !

खुबसूरत भाव भरी रचना , बधाई .

पोला पर्व की भी बधाई .

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्दर भावों को अपने में समेटे शानदार कविता.