Thursday, July 21, 2011

राजदुलारा बच्चा !

कल रात, मेरे अंतर्मन ने
मेरे सामने आकर मुझसे कहा - सुनते हैं
लोग बहुत, बहुत अच्छा लिख रहे हैं
तुम क्यों नहीं लिखते, अच्छा !
मैं थोड़ा घवाराया, सम्भाला खुद को
फिर धीरे से बोला - लिख तो रहा हूँ !
वह भड़क गया, और डांटते हुए बोला -
क्या ख़ाक लिख रहे हो !!
अगर नहीं लिख सकते अच्छा
तो बंद कर दो लिखना-लिखाना
फिजूल में समय खराब कर रहे हो
खुद का, और भोले-भाले पाठकों का
तुम लिखते भी हो, तो कुछ भी लिख देते हो
खाली-पीली, अगड़म-बगड़म, टाईम-खोटी
क्या तुमको शर्म नहीं आती ?
क्या कहता, क्या कहता उससे
था तो मन मेरा ही वो, और गुस्सा भी जायज था
कान पकड़ कर मैंने बोला - माफ़ करो, मुझे माफ़ करो
कल से कोशिश करूंगा मैं भी, कुछ अच्छा लिख लेने की
जो अच्छा हो, न कच्चा हो, कोमल-कोमल
सच्चा-सच्चा, प्यारा-प्यारा, राजदुलारा बच्चा हो !!

3 comments:

JAGDISH BALI said...

Very nicely un have put it.

संजय भास्कर said...

beautiful post. THis poem touched my heart,
excellent write!

प्रवीण पाण्डेय said...

मीठा मीठा हो, ग्राह्य हो।