Friday, July 22, 2011

गुनाहों की सजा !

एक महानगर के धन्ना सेठ का विगत - माह से स्वास्थ्य अत्यंत खराब चल रहा था धन्ना सेठ होने के नाते इलाज-पानी में कोई कमी नहीं थी अच्छे-से-अच्छे डाक्टर से इलाज करवाया जा रहा था किन्तु सेठ जी का स्वास्थ्य सुधरने की जगह बिगड़ता ही जा रहा था. अच्छे-से-अच्छे इलाज के बाद भी स्वास्थ्य ठीक होते देख परिवार के सभी सदस्य बहुत ही चिंतित होने लगे थे, चिंता की मुख्य बजह यह नहीं थी कि सेठ जी के पैर का मामूली सा चोट का निशान धीरे धीरे बढ़ते जा रहा था वरन चिंता की मुख्य बजह यह थी कि सेठ जी का पैर धीरे धीरे सड़ने गलने लगा था . सेठ जी की अस्वस्थ्यता के कारण सारे घर में मायूसी सी छाने लगी थी घर का एक एक सदस्य अत्यंत चिंतित था, घर के सदस्यों की बढ़ती चिंता को देख देख कर सेठ जी भी चिंतित होने लगे थे. परिवार के सदस्यों के माथे पर दिनों-दिन चिंता की लकीरें बढ़ता देख सेठ जी से रहा नहीं गया और उन्होंने परिवार के सभी सदस्यों को इकट्ठा कर अपनी आप बीती सुनाई, सेठ जी ने कहा - मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों, मैंने अपने जीवन की एक सच्चाई तुम सभी से छिपाई है वो सच्चाई यह है कि हम खानदानी सेठ-साहूकार नहीं हैं, जीवन के शुरुवाती सफ़र में मैं एक चोर था तथा चोरी-चपाटी कर अपना जीवन-यापन करता था, एक दिन मैंने एक बहुत बड़ी चोरी की थी जिसमे ढेर सारे सोने-चांदी के जेवरात नगदी रकम मेरे हाँथ लगी थी, उस चोरी के बाद मैं शहर में आकर बस गया तथा यहीं पर व्यवसाय करने लगा धीरे धीरे हम इस मुकाम पर पहुँच गए कि आज हम नगर के सबसे बड़े सेठ हैं, चोरी-चपाटी तो मेरे छोटे-मोटे गुनाह हैं किन्तु मेरा सबसे बड़ा गुनाह यह है कि उसी बड़ी चोरी में मुझे "माँ दुर्गा" की सोने की मूर्ति भी हाँथ लगी थी जिसे मैंने एक सोनार के पास जाकर आँखों के सामने बैठकर गलवा कर अपने पास रख लिया था जो आज भी तिजोरी में सोने के डिल्ले के रूप में रखी है, मेरा शरीर धीरे धीरे गलने लगा है शायद यह मेरे उसी गुनाह की सजा है जो मैं अपनी आँखों से शरीर को गलता देख रहा हूँ, काश ! मैंने वह मूर्ति गलवाई होती तो शायद आज मेरी यह हालत होती, मेरे बच्चों जाओ जाकर उस सोने के डिल्ले को उठाकर उसमे उतने ही बजन का सोना और मिला कर एक नई "माँ दुर्गा" की मूर्ति बनवा कर किसी दुर्गा मंदिर में चढ़ा दो ताकि मेरे गुनाहों की सजा तुम्हें भोगना पड़े तथा तुम लोग मेरी चिंता करना छोड़ दो, मेरी बीमारी कुछ और नहीं मेरे गुनाहों की सजा है !!

3 comments:

वन्दना said...

इंसान को उसके गुनाहो की सज़ा यहीं भोगनी पडती है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सरे पापों का हिसाब किताब यहीं हो जाता है ..अच्छी कहानी

प्रवीण पाण्डेय said...

कर्मों का प्रतिफल मिलता है।