Saturday, July 23, 2011

किसी ने दिल से नहीं, दिमाग से बेवफाई की है !

सलीके के लिबास पहन के निकला करो घर से
दिल बच्चा सही लेकिन मेरी आँखें सियानी हैं !
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नहीं गुनाह किया हमने, सिर्फ चाहा है तुम्हें
आँखें बोलते रहीं पर जुबां खामोश ही रही !
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तेरी मोहब्बत में कर तो लेते बगावत सारे जहां से हम
जब दौलतें ही न होतीं, तब फुटपात पे कैसे जीते हम !
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न कहीं हुक्म हैं, और न ही हुक्मरान हैं
उफ़ ! सब के सब सत्ता के कद्रदान हैं !!
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कोई जाके, क्यों समझाता नहीं हुक्मरानों को
कब तक, कोई रोक पायेगा, युवा तूफानों को !
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सलाखें घोंच घोंच के, धड़कनें टटोल रहे हैं लोग
कहीं ज़िंदा रह न जाऊं, तसल्ली कर रहे हैं लोग !
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कभी रिंग, कभी बाईब्रेट, तो कभी साइलेंट में
सच ! होती खूब अदाएं हैं, तेरी हरेक मोड में !
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चहूँ ओर आम आदमी, आम आदमी का हल्ला बोल है
लोकतंत्र के सभी खानों में, आम आदमी गोलमोल है !
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आज तो दिल गुमसुम, और दिमाग सन्नाटे में है 'उदय'
किसी ने दिल से नहीं, दिमाग से बेवफाई की है !!

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब।

anu said...

sach mei...har sher apne aap mei..bahut khub