Saturday, April 16, 2011

... गर जरुरत न रहे, तो वे खुद ही 'खुदा' होते हैं !!

'खुदा' की रहमत ने, सच ! बाजीगर बना दिया है मुझे
कदम कदम पर जिन्दगी, किसी बाजी से कम नहीं !
...
मेरी इबादत ने, उसे देवी बना दिया था 'उदय'
जब से छोड़ दी इबादत मैंने, वो सड़क पे है !
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कब तलक लड़ते रहेंगे, भाषाओं की ज़ुबानी जंग
कहीं कुछ फर्क नहीं दिखता, तेरे मेरे जज्बातों में !
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सुकूं की चाह में, श्मशान में जा बैठे थे
कहां था इल्म, वहां भी सुकूं नहीं होगा !
...
'रब' जाने, क्या संभव और क्या असंभव है
सच ! हम तो चलते हैं, बस चले चलते हैं !
...
सच ! मौके मौके पे, वो मुझे याद कर लेते हैं
गर जरुरत रहे, तो वे खुद ही 'खुदा' होते हैं !!

6 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सुकूं की चाह में, श्मशान में जा बैठे थे
कहां था इल्म, वहां भी सुकूं नहीं होगा !


होता है, होता है!

Travel Trade Service said...

आरे वाह भाई जी ....क्या बात कही है !!!!!!!!!!!

राज भाटिय़ा said...

जबाब नही जी आप की गजल का, बहुत सुंदर. धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी सटीक पंक्तियाँ।

kshama said...

मेरी इबादत ने, उसे देवी बना दिया था 'उदय'
जब से छोड़ दी इबादत मैंने, वो सड़क पे है !
Bahut khoob! Waise sabhee ashaar ekse badhake ek hain!

संजय भास्कर said...

मेरि तरफ से मुबारकबादी क़ुबूल किजिये.