Wednesday, March 23, 2011

उफ़ ! डरना, और डर कर, डराने की कोशिश की है !

गर मैं उतर जाऊं जमीं पे, तो यकीं नहीं होगा

लोग पत्थर को पूजेंगे, तो मैं 'खुदा' कहलाऊँ !

...

ये तो हमें खबर ही कहाँ थी, तुम बैठे हो इंतज़ार में
सच ! सौ काम छोड़कर भी, हम दौड़े चले आते !
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जिसको जाना था, ठहरा नहीं, चला गया

अब तो यादों में ही रहेगा बसेरा उसका !

...
अब
क्या कहें, दिल तो चाहे था मेरा, शब्दरूपी रंग-गुलाल संग
तेरे दिल, मन, और जज्बातों को रंग रंग के कहता हैप्पी होली !
...
सोचूँ तो बस सोचता रहूँ, फिर कहाँ ठहरती है सोच मेरी
कहीं कुछ तो है जरुर, जो मेरी सोच को ठहरने नहीं देता !
...
ये तो किन्हीं नासमझों ने, आत्मघाती पहल की है
उफ़ ! डरना, और डर कर, डराने की कोशिश की है !

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जो भी डरा ले जाये।

राज भाटिय़ा said...

गर मैं उतर जाऊं जमीं पे, तो यकीं नहीं होगा

लोग पत्थर को पूजेंगे, तो मैं 'खुदा' कहलाऊँ !
बहुत खुब जी.

अरूण साथी said...

उदयजी एक एक शेर लाजबाब। खास कर खुदा कहायेगे। कितनी गंभीर बात कही। यही होगा।
बधाई।