Wednesday, February 23, 2011

सरकारी लंगर, उफ़ ! ऐसे लगे, जैसे कोई खानदानी हो !

खुशी और गम का बसेरा है 'उदय', सुबह-शाम की तरह
आज गम का मंजर है, तो कल खुशी का सबेरा होगा !!
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हंगामा क्यों है बरपा, लोकसभा-विधानसभाओं में
सच ! कहीं कुछ लोकतंत्र की चाल बिगाड़ी गई है !
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बातों बातों में, हर रोज झूठी कहानी, जाने कब तक
उफ़ ! आँखों में, कहीं कुछ, सच छिपा रक्खा है तुमने !
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कोई कुछ भी कहे, हंसी तेरी बेहिसाब है
चले आओ बाहर, मौसम लाजवाब है !
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लहू बन पसीना टपकने लगा खेत में
खेती हरी-भरी रहे तो कितने देर रहे !
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कोहरा, शीत, धुंध, सर्द, सरसराती हवाएं
सच ! चलो चलें, मौसम क्या कमाल है !
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दस्तूर, मांगने या देने में फर्क, सब मिट गया यारो
क्या सीखना, क्या सिखाना, सब अमलीजामा है !
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पारंगत तो हैं ही, अब परम्पराएं निभा रहे हैं
कोई जीते, कोई हारे, पैसे खूब कमा रहे हैं !
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इल्जाम की उंगली उठाकर, सुकूं नहीं संभव
सच ! हमें भी देखना होगा, अपने गिरेबां को !
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क्या शान-शौकत, चुस्ती-फुर्ती, खाना-पीना है 'उदय'
सरकारी लंगर, उफ़ ! ऐसे लगे, जैसे कोई खानदानी हो !

4 comments:

JAGDISH BALI said...

नि:संदेह जीवन खुशी और गम का खेल है !

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति| धन्यवाद|