Sunday, January 30, 2011

लोग लगते हैं गले, दिलों में फासला रख कर !!

और क्या, जो था, लुटा के लुट गए
उफ़ ! पछतावा है, खाने के लाले हुए !
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कोई मुझे, दूर से सराहता रहा, शुक्रिया उसका
सच ! वो होता, तो मैं जीतता कैसे !
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कोई गम अपने, छिपा-छिपा के, मुझे हंसाता रहा
सच ! फ़रिश्ता था, आज मुझे रुला के चला गया !
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क़ानून, वकील, जज, अदालत, फैसला
उफ़ ! कोई जीत गया, कोई हार गया !
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गर तुम भी मनाते, तो हम मान जाते
सच ! ये हम जानते हैं, तुम हो जीवन हमारे !
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प्यार हुआ-शादी हुई, तकरार हुई-तलाक हो गया
उफ़ ! क्या करें, खुदगर्ज हैं फिर साथ साथ हैं !
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एक नजरिया आपका है, और एक है किसी और का
फर्क दोनों में है, फर्क है, तो है नजर का !
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वादे
-झूठे, यादें-भूले, मिले-बिछड़े, खुशी-गम
सच ! जोर नहीं, जीवन के दस्तूर निराले !
...
क्या खूब, मान-सम्मान का दौर है 'उदय'
उफ़ ! कोई खुश, तो कहीं कोई मायूस हुआ है !
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अफ़सोस तो है, हम खुद को असहाय समझते हैं 'उदय'
चाहते नहीं, नहीं तो, ये भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचारी कहाँ लगते हैं !
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कुत्ते, बिल्ली, चूहे, गिरगिट, उल्लू, गधे, गिद्ध, लोमड़ी
सच ! इन्हीं का बोलबाला है 'उदय', ये मिलकर शेर हुए हैं !
...
तुम्हारी जुल्फें, सच ! कितनी सुहानी हुई हैं
चिलचिलाती धूप है, फिर भी लगे शाम हुई है !
...
कब, कैसे, हम तुम में, सिमटते रहे
उफ़ ! फासला रहा, फना हो गए !
...
इश्क ने तेरे, हौसला दिया है मुझे
अब तो हर आरजू, पूरी अपनी है !
...
सच ! शहर बदला, मिजाज बदल गए
लोग लगते हैं गले, दिलों में फासला रख कर !

6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अब सब मिलकर शेर हो गये हैं।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आज तो खूब गजब ढ़ाया है सच और उफ ने..

मनोज कुमार said...

सच ! शहर न बदला, मिजाज बदल गए
लोग लगते हैं गले, दिलों में फासला रख कर !
वाह! कड़वा सच।

अरविन्द जांगिड said...

बेहतरीन....आभार

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

उदय जी , हर नज़्म बहुत ही भाव पूर्ण और सच्चाई बयां करती हुई .. बेहतरीन प्रस्तुति.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

har sher behatreen...
sundar chitran...yatharth ka.