Saturday, January 22, 2011

... इज्जत ... सच ! अगर चाहो तो, किराए पर ले लो !!

खुशनसीबी है, कोई खुद को खुदा समझ बैठा
उफ़ ! लाचारी है हमारी, जो उसे हम पूज लेते हैं !
...
चलो, जल्दी करो, निकल लो, भ्रष्टों का शहर है
कहीं ऐसा हो, लुट जाएँ, और यहीं भटकते फिरें !
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शर्मसार होने का अपना अलग लुत्फ़ है 'उदय'
उफ़ ! लोग हंस हंस कर मजे ले रहे हैं !
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क्या करें, याद रख के भी, कोई सुनता कहाँ है
उफ़ ! कहने को तो सरकार हैं, पर असर कहाँ है !
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कोई तो है जिसे देख के जी लेते हैं
वफ़ा, बेवफा, से कोई वास्ता नहीं !
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आँखें, दिल, दिमाग, सिहर गए
सच ! कहानी, प्रेम कहानी जैसी थी !
...
सुबह, शाम, दिन, रात, चलते-चले-चलते हैं
उफ़ ! चलते चलते जिन्दगी ठहर जाती है !

तुझे
चाह कर कुर्वान कर दिया था सब कुछ
उफ़ ! जीत की चाह थी, तो कह दिया होता !
...
कर अफसोस, जिन्दगी क्यूं नहीं संवरी
सच ! अभी भी वक्त है, क्यूं संवारा जाए !
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अब क्या करें, शीला, मुन्नी, हमें भाने लगीं हैं
अब तो दिल धड़कता है, बस उन्हीं के नाम से !
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हिन्दू-मुस्लिम मिले, जज्बे मोहब्बत के खिलने लगे
उफ़ ! शैतानों की बस्ती है, 'खुदा' बुरी नजर से बचाए !
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सलाह पर, ज़रा लचके थे, गधा लपक के मचक गया
उफ़ ! अब शान से कहता है, चल मेरे घोड़े, टम्मक टू !
...
जमीर बेच के, शान--शौकत से ज़िंदा हैं बहुत
सच ! खुश हैं, बहुत दौलत समेट के रख ली है !
...
अंगडाईयों को हसरतें समझना गुस्ताखी होगी 'उदय'
सच ! सुना है वो, अंगडाई शौक से लेते हैं !
...
विशेष सूचना - यहाँ इज्जत बेची नहीं जाती
सच ! अगर चाहो तो, किराए पर ले लो !!

9 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

एक से बढ़कर एक..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जमीर बेच के, शान-ए-शौकत से ज़िंदा हैं बहुत
सच ! खुश हैं, बहुत दौलत समेट के रख ली है !

...
विशेष सूचना - यहाँ इज्जत बेची नहीं जाती
सच ! अगर चाहो तो, किराए पर ले लो !

बहुत खूब ...सारे ही एक से बढ़ कर एक

Dinesh Mishra said...

बहुत ही उम्दा...!!

प्रवीण पाण्डेय said...

किराये पर ही चल रहा है देश।

निर्मला कपिला said...

अच्छी प्रस्तुति। बधाई।

Vivek Rastogi said...

बेहतरीन.. पर यहाँ किराये पर भी इज्जत की जरुरत नहीं लोगों को.. कर्नाटक संदर्भ में..

Rahul Singh said...

मासिक दर पर सस्‍ती भी होती होगी.

अरविन्द जांगिड said...

वाह जी वाह, बहुत खूब

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर ओर बहुत तीखी लगी आप की यह गजल, आज के समाज के मुम पर करारा तमाचा, लेकिन मन को बहुत अच्छी लगी, धन्यवाद

जमीर बेच के, शान-ए-शौकत से ज़िंदा हैं बहुत
सच ! खुश हैं, बहुत दौलत समेट के रख ली है !
वाह वाह