Friday, January 21, 2011

माँ तड़फती है, टपकता लहू देख कर !!

खुदा, सनम, उलफत, राहें, जिन्दगी
सच ! चलो मिलबांट के बसर कर लें !
...
शब्द, इच्छा, प्रेम, दस्तक, दहलीज
सच ! चलो आजमा लें !
...
फरेब उतना नहीं अंधेरों में
शायद हो जितना, सुबह के उजालों में !
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गुंजाइशों की जगह बरकरार रखना यारो
आशिकी में तकरार और सुलह, आम बात है !
...
दफ्न कर के भी, सुकूं मिला शायद
अब भी बैठे हैं, कब्र पे इठलाते हुए !
...
तुम सही, तुम्हारी बेवफाई के निशां, बहुत काम आए
सच ! हम वफ़ा भूल गए, फिर कोई बेवफा निकला !
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सच ! तुम होती हो, रात गुजर जाती है
तुम्हारी याद में जलना खुशगवार नहीं !
...
रात, चिराग, दिल, यादें, इंतज़ार में हैं
सच ! शायद कोई वादा भूल गया है !
...
अब हमने भी, दुश्मनी के गुर सीख लिए हैं
चलो अच्छा हुआ, चहूँ ओर सन्नाटा है !
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गर चाहो मेरे फुर्सत के पलों में, सुस्ता लो ज़रा
सच ! सफ़र लंबा है, मुझे चलते जाना है !
...
सब कुछ लुटाया था मैंने तुझ पर, शायद अंधा था
उफ़ ! भूत इश्क का उतर गया, अब सड़क पर हूँ !
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क्या अदब, क्या शान-शौकत है, मगर अफसोस
सच ! दौलत को ही सब कुछ समझते हैं !
...
खंजर फेंक दो, गले लग जाओ यारो
माँ तड़फती है, टपकता लहू देख कर !
...
उफ़ ! कब तक सहें धमकियां, कल गिराते हैं तो आज गिरा दें सरकार
क्या फर्क पड़ना है, स्वीस बैंक में जमा कालाधन कौनसा मेरा अपना है !

14 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

कालाधन किसी अड़ोसी-पड़ोसी का तो हो सकता है.

संजय भास्कर said...

@ उदय जी
बिलकुल सत्य कहा आपने
तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

संजय भास्कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

प्रवीण पाण्डेय said...

आक्रोश का स्वर परिपूर्ण है, कुछ और न कहा जाये, इस पर।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

gazab ki aag bhari hai aapke sheron me .

Kailash C Sharma said...

दफ्न कर के भी, सुकूं न मिला शायद
अब भी बैठे हैं, कब्र पे इठलाते हुए !

लाज़वाब...बहुत सुन्दर प्रस्तुति

alka sarwat said...

भावनाओं को सलाम!

JAGDISH BALI said...
This comment has been removed by the author.
JAGDISH BALI said...
This comment has been removed by the author.
JAGDISH BALI said...

वर्तमान परिपेक्ष में उम्दा लेखन !

ManPreet Kaur said...

bahut hi umda likha hai ..
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राज भाटिय़ा said...

दफ्न कर के भी, सुकूं न मिला शायद
अब भी बैठे हैं, कब्र पे इठलाते हुए !
बहुत सुंदर जी.

अरविन्द जांगिड said...

कब्र पे बैठे इठलाते हुए....क्या खूब कहा.

amit-nivedita said...

बहुत ही उम्दा...