Sunday, September 5, 2010

सवाल और मैं !

कुछ अजब
कुछ गजब
सन्नाटा सा था
चंद रातें
कभी सोतीं
कभी जागतीं
खुली आँखों से कभी
कभी मूंदकर आँखें
मैं देखता सा था
क्या था
क्यों था
कुछ तो था
जिसने मुझे
बेचैन किया था
थी अजब सी
कुछ बेचैनी
क्या थी
क्यों थी
यह सवाल बन
मेरे जहन में
घूमता सा था
चंद रातें
बेचैनी, सवाल
और मैं !

7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जब समझ नहीं पाते हैं कि क्या करना है तो मेरा मन अक्सर मुझसे ये बातें करता है।

ओशो रजनीश said...

बहुत अच्छी पंक्तिया है .......

यहाँ भी आइये : --
(आजकल तो मौत भी झूट बोलती है ...)
http://oshotheone.blogspot.कॉम

ललित शर्मा-ললিত শর্মা said...

बेहतरीन लेखन

रश्मि प्रभा... said...

चंद रातें
बेचैनी, सवाल
और मैं !
bahut badhiyaa

arvind said...

antardwand ko pragat karti acchhhi rachna.

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति।

हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

हिंदी और अर्थव्यवस्था, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

shama said...

थी अजब सी
कुछ बेचैनी
क्या थी
क्यों थी
यह सवाल बन
मेरे जहन में
घूमता सा था
चंद रातें
बेचैनी, सवाल
और मैं !
Lagta hai,jaise ham bhi kabhi inheen ahsaason se guzare hon!Nihayat sundar!