Wednesday, June 23, 2010

"आखिरी सुपाडी"

पार्ट -

"बी" कंपनी का बॉस ... टी.व्ही. देखते देखते भडक उठा ... ये "गोली" इधर आ ... हां बॉस ... ये ब्लागिंग क्या है ... कोई नया गेंग बनेला है क्या बॉस ... अबे घोंचू ... बुला सबको जितने हाजिर हैं ... हां बॉस ... गेंग के सारे सदस्य इकट्ठे ... सारे टेंशन में ... क्या हो गया बॉस को ... हां बॉस किसी को टपकाना है क्या ... ट्पकाना-पपकाना छोड ... ये बता "ब्लागिंग" क्या होती है ... अभी टी.व्ही. पे समाचार आ रईला था कि ... वो अपुन का बुडु अमिताभ बच्चन "ब्लागिंग" स्टार्ट कर लेईला है ... क्या है रे ये ... कोई बतायेगा ... बास अपुन को नईच मालुम ... अबे साले तुम लोग घोंचू के घोंचूस रहोगे ... चल चल फ़ोन लगा बुडु को ...

... अमिताभ बच्चन को फ़ोन ... स्पेशल नंबर से ... फ़ोन की घंटी बजी ... अमिताभ टेंशन में ... मन में सोचते हुये ... ये भाई काय को फ़ोन कर रेला है ... हां भाई आदाब ... आदाब बडे मियां ... कहां हो, कैसे हो ... बस मुम्बई में, कुछ खास नहीं ... बडे मियां ये बताओ ... ये ब्लागिंग का कौन सा कारोबार शुरु किया है ... वहां अपुन को इंट्री करने को मांगता ... छोडो न भाई ... फ़ालतु, बकवास है ... टोटल टाईम पास है ... नहीं बडे मियां ... जब तुम स्टार्ट किऎला हो तो अपुन को भी करनाईच पडेगा ...

... भाई "ब्लागिंग" में बहुत लोचा है ... गुटबाजी है ... पसंद/नापसंद ... हवाले/घोटाले ... टीका/टिप्पणी ... अनामी/बेनामी ... बहुत लफ़डा है वहां ... आपके लायक जगह नहीं है ... वहां का साला हिसाब - किताब ही समझ नहीं आता है ... अपुन के जैसा नामी-गिरामी आदमी ... बोले तो अमिताभ बच्चन बिग बी" ... अपुन का कोई नंबर नहीं है वहां पर ... पर ये लोचा करता कौन है वहां ... जहां आपका भी दाल नहीं गल पा रहा है ... छोडो न भाई ...

... अब छोडने का नई बडे मियां ... अब तो "ब्लागिंग" करनाईच पडेगा ... अपुन देखता है साले को ... वहां कौन कौन चिरकुट दुम हिला रहेला है ... आप तो एक "ब्लाग" बना दो मेरे नाम का ... फ़िर देखते हैं ... तो ठीक है भाई शाम को चार बजे आकर बना देता हूं ... ठीक है बडे मियां ... खुदा हाफ़िज ... अबे ये "गोली' इधर आ ... भेज दो-चार "शूटर" पता लगा के आयेंगे कौन कौन ब्लागिंग में ऊपर चल रहेला है और उनका फ़ोन-वोन नंबर ... पूरा अता-पता ले के आयेंगे ... फ़िर देखते हैं ब्लागिंग क्या बला है ... कौन कौन चिरकुट लोग है साला जो बडे मियां को पीछे ढकेल कर रखेला है .... ब्लागिंग कोई टेडी-मेडी चीज है क्या रे ... चल देखते हैं शाम को ... !!!

(काल्पनिक कहानी ... डान स्पेशल सीरीज पर एक पुस्तक "आखिरी सुपाडी" लिखने की योजना है ... साथ ही साथ इस स्टोरी पर "डान" फ़िल्म बनाने पर भी चर्चा चल रही है)
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पार्ट -

"बी" कंपनी का हेडक्वार्टर ... ऎ 'गोली' इधर आ ... हां बॉस ... शाम के चार बजने वाले हैं 'बडे मियां' के आने का टाईम हो गईला है ... चाय-पानी का इंतजाम कर ... और हां सब चेले-चपाटों को बोल ... बडे मियां को अदब के साथ अंदर ले के आने का ... हां बास ये सब पहलेच से समझा देयला है ... अपुन को पता है आप बडे मियां को कितना मान-सम्मान देते हो ... सब इंतजाम हो गएला है ... आप चिंता नको करो ...

... बडे मियां मतलब अमिताभ बच्चन का आगमन ... बॉस स्वंय खडे होकर ... आईये बडे मियां ... आईये ... आदाब ... आदाब ... हां भाई ... बस बडे मियां खुदा का शुक्र है ... मौजे ही मौजे हैं ... सुनो भाई कभी कभी मेरी बात भी मान लिया करो ... क्या हो गया बडे मियां ... अरे मेरा मतलब "ब्लागिंग" से है वो आपके काम की चीज नहीं है ... फ़ालतु बकवास है ... वहां खाली-पीली का टेंशन है ... किसी दिन आपको गुस्सा आ जायेगा तो बे-वजह ही दो-चार ब्लागर को टपका डालोगे ... नहीं बडे मियां ऎसा नहीं होगा ....

... अभी तीन-चार दिन पहले की बात है कुछ ब्लागर टेंशन में थे ... कोई नया ब्लागर आया है "कडुवा सच" लिख लिख कर सीनियर ब्लागरों की वाट लगा रेयला है उसको धमकी-चमकी देने की सुपाडी देने-लेने की बात हो रईली थी ... ये बात उडते-उडते मेरे कान तक आई थी फ़िर पता नहीं क्या हुआ ... फ़ोकट का टेंशन है न भाई इसीच लिये तो आपको मना कर रेइला हूं ... हां बडे मियां आप सच बोल रेइला है ... तीन-चार दिन पहले वो सुपाडी अपुन ही लियेला था ...

... ऎ 'गोली' ... वो कडुवा सच ... फ़र्जीवाडा ... क्या हुआ रे उस सुपाडी का ... हां बॉस वो तो तुरंत कर डाला था ... अपुन खुदिच्च किये ला था उसको फ़ोन ... साला अकडु टाईप का आदमी लग रेइला था ... सीधा सीधा समझा दिया उसको कि ये तूने जो फ़र्जीवाडा का राग लगाया हुआ है तुरंतिच बंद कर डाल ... नई तो तेरे को टपका डालेगा ... भाई का आदेश है ... देख पता कर उसने फ़र्जीवाडा बंद करा या नहीं ... अभिच पता करता हूं बॉस ...

... हां बडे मियां ... मै आपको समझाया न भाई इस ब्लागिंग के चक्कर में मत पडो ... बेकार में ही चमका डाला उस बेचारे को ... अब "ब्लाग" है जिसकी जो मर्जी आयेगी लिखेगा ... "ब्लाग" बना ही उस लिये है ... गलत किये हो भाई उसको धमकी देकर ... अब छोडो न बडे मियां अपुन का ऎइच्च काम है ... गोली आ गया ... बास उसने फ़र्जीवाडा तो बंद कर दिया है पर ... पर क्या रे सीधा सीधा बोल क्या होइला ... बॉस वह अपुन लोग के बारे में लिखना स्टार्ट कर देइला है ... बोले तो ... बोले तो क्या ... अब बडे मियां ही समझायेंगे ...

... छोडो न भाई ... लेखक लोग हैं लिखते रहते हैं कुछ भी ... लो लैपटाप भी चालू हो गया ... लो देखो "कडुवा सच" ... आपकी तारीफ़ ही कर रेयला ... कुछ बुरा नहीं लिखा है ... चलो ठीक है जाने दो ... अब मेरा "ब्लाग" बना दो ... एक शर्त पे बनाऊंगा ... आप किसी को धमकी चमकी मत देना और जब कभी गुस्सा आये तो सीधा मुझे बताना ... मैं सब ठीक कर दूंगा ... पर खून-खराबा ब्लागजगत में नहीं होना चाहिये ... ठीक है बडे मियां ... मैं वचन देता हूं ...

... अब ठीक है ... पर ब्लाग पर लिखोगे क्या ... आप के पास तो टाईम ही नहीं रहता ... सब हो जायेगा बडे मियां ... आप तो जानते हो अपुन के डान बनने के पीछे की असल कहानी ... अधूरी प्रेम कहानी ... पूरी हो जाती तो अपुन डान थोडेइच्च बनता ... आज भी अपुन का दिल हिन्दुस्तानी है ... ये घोडा, सुपाडी, खून-खराबा ... बस सब दिखावा है अंदर से तो अपुन ... अब छोडो न बडे मियां आप तो सब जानते हो ... अब अपुन "ब्लाग वर्ल्ड" के माध्यम से दुनिया को बताएगा कि "डान" भी आखिर इंसान ही होते हैं ... ठीक है भाई ठीक ...

... चलो बताओ क्या नाम रखना है ब्लाग का ... कुछ भी रख दो बडे मियां ... कुछ भी नहीं ... कुछ खास होना चाहिये ... जो लिखोगे उसके अनुरुप होना चाहिये ... अपुन सुपाडीच्च के बारे में लिखेगा बडे मियां ... अपुन ने हर सुपाडी को आखरी सुपाडी समझा ... पर सुपाडी खाते चले आया ... सुपाडीच्च की दास्तान लिखूंगा ... इसलिये ब्लाग का नाम "आखिरी सुपाडी" ठीक रहेगा ... तो लो भाई ये रहा आपका ब्लाग "आखिरी सुपाडी" ... अपुन को जो वचन दिये हो उसे हमेशा याद रखना ... बिलकुल याद रहेगा बडे मियां ... खुदा हाफ़िज ... खुदा हाफ़िज ...!!!
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पार्ट -

अपुन का ब्लाग बन गएला है "आखिरी सुपाडी" ... तो अपुन शुरु करता है पोस्ट "पहली सुपाडी" से ... ये उन दिनों की बात है जब अपुन की उमर सत्रह साल आठ माह की रही होगी ... अपुन ने बडे मियां की फ़िल्म "दीवार" फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो देखेला था उसीच दिन अपुन बडे मियां का बहुत बडा फ़ैन हो गएला था ...

... शाम को राशन की दुकान वाला बनिया उधारी पैसों को लेकर ... मां को अनाप-शनाप बक रेला था ये अपुन से बरदास्त नहीं हुआ अपुन वहींच्च भिड गया था उससे ... वो तो मां अपुन को पकड कर घर ले आई थी नहीं तो ... बनिया हर किसी के साथ अंड-संड बोला करता था ... अपुन को पता था पडोस के दूसरे बनिये के साथ उसका झगडा चल रहेला था ... अपुन का खून खौल रहेला था कि उसने मां को बहुत बुरा सुनाया है ...

... अपुन सीधा दूसरे बनिये के पास गया और बोला ... क्यों सेठ तेरा सामने वाले बनिया से खुन्नस चल रहेला है ... बोल तो आज उसको टपका देता हूं ... बोल क्या देगा ... जो मांगेगा दे दूंगा १०० रुपये ... टपका डाल साले को बहुत अकडता है साला ... चल ठीक है तेरा काम हो जायेगा ... निकाल १०० रुपए का नोट तेरा काम कर देता हूं ... सेठ ने खट से १०० का नोट निकाल कर दे दिया ... हां सेठ एक काम और करना अपुन तेरा काम कर के गांव छोडकर भाग जायेगा ... मेरी मां को कभी भी कोई जरुरत पडे तो उसकी मदद करते रहना ... नहीं तो आकर ... नहीं नहीं तू जा उसकी चिंता छोड मैं देख लूंगा ...

.... अपुन सीधा बनिये की दुकान के बाहर दुकान बंद होने का इंतजार करने लगा ... जैसे ही बनिया दुकान बंद कर घर जाने लगा अपुन उसके पीछे हो लिया जैसे ही वह सुनसान गली में पहुंचा ... अपुन ने लपक के साले का टेटुआ दबा दिया ... जब वो निपट गया तो अपुन सीधा स्टेशन पहुंच कर मुम्बई-हावडा मेल में सवार हो गया ... ट्रेन चलते जा रही थी और अपुन को मां की याद सताते जा रही थी ... अपुन कहां जा रहा था नईच्च पता था ... धीरे धीरे पछतावा होने लगा ... अपुन को उसे टपकाना नहीं था यहिच्च सोच सोच कर सारी रात आंख नहीं लगी ...

... सुबह होते होते अपुन को रोना जैसा आने लगा ... गांव वापस लौटना भी मुश्किल था, मां की याद भी सताते रही ... अपुन ने कसम खाया कि ... किसी को मारने का सुपाडी नहीं लेगा ... चाहे दीवार फ़िल्म की तरह जूता पालिश ही क्यों न करना पडे ... अपुन ने कान पकड के कसम खाया ये अपुन की पहली और "आखिरी सुपाडी" है ... मुम्बई पहुंच के कुछ काम कर लेगा पर किसी को मारने की सुपाडी कतई नहीं लेगा ... याद है अपुन को आज भी वो १०० का नोट ... जिसे चलती ट्रेन के दरवाजे पे खडा होकर अपुन ने आंख मूंद कर हाथ में लेकर उडा दिया था .... !!!

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पार्ट -

... चलो आज आपको अपुन "दूसरी सुपाडी" की दास्तां सुना रहेला है ... मुम्बई स्टेशन के प्लेटफ़ार्म आसपास तीन दिन तीन रात गुजर गएला था ... चाय ढेले, पान गुमठी, पाव भाजी सेंटर, होटल, अस्पताल, प्लेटफ़ार्म के दुकान वालों ... सभीच्च के सामने अपुन हाथ-पैर जोडा, गिडगिडाया पर अपुन को कोईच्च नौकरी नहीं दिया ... जेब में फ़ूटी कौडी नहीं और तीन दिनों से भूखा मुसाफ़िर खाने के बाहर एक बेंच पर गुमसुम बैठा सोच रहेला था ... क्या होगा, क्या करूंगा ... रही बात खाने की ... कोई नई बात नहीं थी मां के साथ पांच-पांच दिन भूखा और मां को सात-सात दिन बिना खाना के जीवन गुजारते देखा था ...

... मन में उथल-पुथल चल रही थी और रात गुजर रही थी ... तभी अचानक एक औरत के चीखने एक बुढ्डे की बचाओ बचाओ की आवाज ने अपुन का ध्यान भंग कर दिया ... एक "गुंडा' और उसके चार चेले उस महिला को जबरदस्ती पकड कर खींच कर ले जा रहे थे ... वह बचाओ बचाओ चिल्ला रही थी कोई आस-पास उसकी मदद करने वाला नहीं था ... बुढडा दौडकर मेरे पैरों में आकर गिर पडा और हाथ जोडकर दया की भीख मांगने लगा ... मेरी बेटी को उन गुंडो से बचाओ बेटा ... वे बदमाश उसकी इज्जत लूट लेंगे ... मेरे पास पूरे बीस हजार रुपये हैं सब तुमको दे दूंगा मेरी बेटी की इज्जत बचा दे बेटा ...

... उसकी बातें सुनकर मेरे अंदर करेंट सा दौड गया ... उठकर उन गुंडों को आवाज देकर रोका ... पास जाकर लडकी को छोडने का बोला तो ... उस हराम के पिल्ले गुंडे ने सीधा चाकू निकाल कर मुझ पर तान दिया ... चाकू को देखकर मेरा खून खौल उठा ... फ़िर आव देखा ताव साले का हाथ पकड कर घुमाकर गर्दन पकड कर मुरकेट दिया ... एक पल में साले ने छटपटा के दम तोड दिया ... लडकी को लाकर उसके बाप के हवाले किया तो उन दोनों ने अपुन के पैर पकड लिये और बोले आप "भगवान" हो हमारे लिये ... अपुन बोला चल चल ठीक है जाओ तुम लोग ... बुढ्डे ने अपनी धोती के कमर में बंधी एक पोटली से पूरे के पूरे बीस हजार रुपये निकाल कर मेरे हाथ में रख दिये ...

... अपुन ने मात्र उससे एक हज्जार रुपया लिया और उन्हें भेज दिया ... जाते जाते वे अपुन को "भगवान" कहते कह्ते चले गये ... उनके जाने के बाद ही उस गुंडे के चारों चेले आकर अपुन के पैरों में गिर गये ... "भगवान दादा" माफ़ कर दो अपुन लोगों से गल्ती हो गई आज से हम आप के चेले बनकर रहेंगे ... अबे घोंचू सालो तुम लोग लडकी की इज्जत पर हाथ डालते हो भाग जाओ नहींच्च तो तुम चारों को भी टपका डालूंगा ... गल्ती हो गई बॉस इसमें हमारा दोष नहीं है जिसका था उसको तो आप ने टपका हीच्च डाला है ... चल चल ठीक है अपुन को पुलिस का लफ़डा नहीं मांगता .... जाओ उसकी लाश को कहीं पटरी-सटरी पे फ़ेंक के ठिकाने लगा देना ....

... हां एक बात और ... ये०० , १०० रुपये पकडो तुम लोग ... और ये १०० रुपये और ... वापस आते समय अपुन के लिये कुछ अच्छा खाना-वाना लेते आना ... ओके बॉस ... उनके जाने के बाद अपुन फ़िर चिंता में बैठ गया ... ये क्या हो गया अपुन ने दूसरे को टपका डाला मतलब "दूसरी सुपाडी" ... ये क्या हो रहेला है अगर ऎसाईच्च चलता रहा तो ... अपुन ने अपने आप को संभाला और मजबूत किया कि अब टपकाने-पपकाने का नहीं ... गुस्से को कंट्रोल करने का ... अपुन ने अपने आप से "गाड प्रामिस" किया कि ये "आखिरी सुपाडी" है ... बेंच पर बैठकर कल के बारे में सोचने लगा ... पर उस बुढ्डे लडकी के मुंह से निकले शब्द "आप भगवान हो" जाने क्यों मेरे कानों में गूंज रहे थे ..... !!!
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पार्ट -

... चलिये आज अपुन सुनाता है आप लोग को "तीसरी सुपाडी" की दास्तां ... जिसने अपुन को एक नया नाम दिया "भगवान दादा" .... हुआ यूं कि लाश को ठिकाने लगाने गये तो चारों चिरकुट थे पर वापस आया सिर्फ़ एक ... जिसका नाम था "गोली" ... गोली ने वापस आकर सारा किस्सा सुनाया था अपुन को ... जिसको अपुन ने टपकाया था उसका नाम था "फ़िरकी पठान" जो "वसूली पठान" का सगा छोटा भाई था ... वसूली पठान मुम्बई का एक दादा था जो दुकानदारों, व्यपारियों तथा फ़ूट्पाथ पर सोने वालों से हफ़्ता वसूला करता था जिसके नाम से सभी लोग थरथर कांपा करते थे ... मतलब ये था कि अपुन ने सीधे तौर पर एक "दादा" से पंगा ले लिया था ... इसी डर से "गोली" के तीन साथी "फ़िरकी पठान" ली लाश ले कर चले गये थे और "गोली" दिल की आवाज सुनकर अपुन के पास गया था ...

... फ़िरकी पठान को अपुन टपकाया है ये खबर मुम्बई में आग की तरह फ़ैल गई थी पर सब ये जानते थे कि तीन दिन बाद "वसूली पठान" आयेगा तो अपुन को टपका डालेगा ... "गोली" ने अपुन के बारे में व्यापारियों दुकानदारों को ये बता रक्खा था कि अपुन दयालु इंसान है और अपुन का नाम "भगवान दादा" है ... सच तो ये है कि अपुन अपना असली नाम भी भूल गया था ... एक सच्चाई तो ये भी थी कि सभी "वसूली पठान" के आतंक से भयभीत थे और उससे छुटकारा भी चाह रहे थे इसलिये उन सभी लोगों ने "गोली" के सामने प्रस्ताव रखा था कि यदि "भगवान दादा" उससे मुक्ति दिला दें तो वे दो गुना हफ़्ता देने को तैयार हैं .... पर सब ये जानते थे कि पिछले बीस साल में किसी की हिम्मत नही हुई जो पांच मिनट भी टिक सका हो "वसूली पठान" के सामने ...

... बिलकुल यही खौफ़ "गोली" की आंखों में भी नजर आता था वह तीन दिन से कहते रहा था "भाई" निकल चलते हैं मुम्बई से बाहर ... आज फ़िर सुबह से ही वह खौफ़ अपुन उसकी आंखों में देख रहेला था क्योंकि आज शाम को "वसूली पठान" आने वाला था ... आज फ़िर "गोली" अपुन के पैर पकड कर मुम्बई से बाहर चलने का बोल रहा था ... उसकी आंखों में खौफ़ देखकर अपुन के अंदर "बिजली" कौंध उठी थी और खून खौलने लगा था ... अपुन ने बोला "गोली" ये बता कहां कहां जायेंगे ... जहां गये वहां भी ऎसा ही फ़िर ... ये बता "मर कर भी चैन न मिला तो किधर जायेंगे" ...

... "गोली" जा सभी व्यापारियों को बोल डाल शाम को हफ़्ता तैयार रखें ... अपुन अब कहींच्च जाने वाला नही है और हां जब "वसूली पठान" आयेगा तो तू व्यापारियों के पास रहना ... जैसे ही अपुन का पलडा भारी लगे तो तू "हफ़्ता" लेना शुरु कर देना ... अगर अपुन खल्लास हुआ तो देख ये अपुन के गले में जो "लाल कपडा" बंधा हुया है ऎइच्च अपुन का "कफ़न" है इसको उडा देना, जिंदा रहा तो तेरे को सुनाऊंगा इस "कफ़न" की कहानी ... चल जा जैसा बोला वैसाइच्च कर ... अपुन का खून खौलना चालूइच्च था कि कब वो साला चिरकुट आये ....

... अपुन चौगड्डे पे ही उसका इंतजार कर रहेला था ... वसूली आया भी तो हिजडों की फ़ौज लेकर शेर की तरह दहाडता आया ... उसे देख कर अपुन का खून उबलने लगा ... अपुन बोला अबे चिरकुट तू इन हिजडों के दम पे उचक रहेला है क्या, हिम्मत है तो अकेला ... वो साला शेर की तरह छलांग लगाते गया ... अपुन ने जब उसको पटकनी देना शुरु किया साला तीन-चार पटकनी में ही टें बोल गया ... जब साले को घुमा के फ़ैंका तो सीधा व्यापारियों की भीड में जाकर गिरा ... गिरते ही साले का दम उखड गया ... चारों तरफ़ से "भगवान दादा" जिंदावाद जिंदावाद के नारे गूंजने लगे ...

... इस सुपाडी के बदले "गोली" को लगभग पचास हज्जार रुपये का "हफ़्ता" इकट्ठा हुआ ... चारों तरफ़ अपुन की जय जय कार होने लगी ... लोग अपुन को "भगवान दादा" के नाम से जानने लगे ... तीन - चार घंटे के बाद ही अपुन फ़िर सोचने पे मजवूर हो गया कि अपुन आज तीसरे को टपका डाला याने की "तीसरी सुपाडी" ... पर इस बार अपुन खुद को समझाया कि ये "आखिरी सुपाडी" है इसके बाद मार-पीट टोटली बंद, अब अपुन चैन से रहेगा "गोली" सब काम संभालते रहेगा .... पर अपुन साला क्या से क्या हो गया लोगों के लिये "भगवान दादा" बन गया ... "भगवान दादा" ... हा हा हा ... हा हा हा हा ... हा हा हा हा हा हा ... (यह हंसी अपुन को भगवान दादा बनने के कारण नहीं आया था वरन हालात पर आया था) ...!!!
...... जारी है .....

12 comments:

ललित शर्मा said...

bahut badhiya kahani hai,
shyam bhai.

bas mauja hi mauja.


shubhkamnayen

vikas said...
This comment has been removed by the author.
vikas said...

बहुत ही बढ़ियाँ...निर्मल हास्य .

अपने कल्पनाओं के खजाने से बस इसी तरह से एक नयी नयी मनोरंजन पोस्ट से हमें मनोरंजित करते रहिये.आभार

विकास पाण्डेय
www.vicharokadarpan.blogspot.com

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

उदय भाई, बहुत बढिया।
--------
आखिर क्यूँ हैं डा0 मिश्र मेरे ब्लॉग गुरू?
बड़े-बड़े टापते रहे, नन्ही लेखिका ने बाजी मारी।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

उदय भाई, बहुत बढिया।
--------
आखिर क्यूँ हैं डा0 मिश्र मेरे ब्लॉग गुरू?
बड़े-बड़े टापते रहे, नन्ही लेखिका ने बाजी मारी।

Suman said...

nice

Suman said...

nice

बी एस पाबला said...

अपुन ने हर सुपाडी को आखरी सुपाडी समझा ..

हा हा हा

बढ़िया!

ब्लाग बाबू said...

अंकल अंकल अपुन भी सुपाडी खाने को मांगता।

ब्लाग बाबू said...

अंकल अंकल अपुन भी सुपाडी खाने को मांगता।

राज भाटिय़ा said...

सच मै किसी भाई वाई ने पढ लिया तो ......
बहुत सुंदर लिखा जी मजे दार.... अपून क्या बोला?

सूर्यकान्त गुप्ता said...

एकदम ठांय ठांय गोली मारा रे बाबा। ब्लोग का नाम बरोबर रखेला है। "आखिरी सुपाडी". सभीच लोग बड़ाई करेला है। अपुन भी खूब बधाई देना मांगता। झकास!