Wednesday, February 18, 2009

शेर - 10

‘उदय’ से लगाई थी आरजू हमने
अब क्या करें वो भी हमारे इंतजार मे थे।

4 comments:

विनय said...

वाह साहब बहुत खूब!

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गुलाबी कोंपलें
चाँद, बादल और शाम

Dileepraaj Nagpal said...

badhiya laga netajee.com per aaker...ek baat btayen ki naam netajee kyun...????

विनय said...

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Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई हम तो उदय जी का शेर पढने के लिए जिस आरजू के साथ बैठे थे , वह तो हमें मिल गया, जिसे हम गुनगुना रहे है और क्या.

चन्द्र मोहन गुप्त