Friday, February 24, 2017

तांडव ...

जहर को मारना है तो जहर पीना पडेगा
धधकते कोलाहल का हमें शंखनाद करना पडेगा

अगर कूदे नहीं तो ये रणभूमि धरा को लील लेगी

औघड़ बनें या काल हम
तांडव की विकराल राह पर अब हमें चलना पडेगा ?

किसे छोड़ें .. किसे मारें ... नहीं शेष सवाल अब ?

जो भी चिंघाड़ता औ रक्त का प्यासा नजर आये
उसका सिर हमें धड़ से अलग करना पडेगा

धरा औ धर्म के अस्तित्व हेतु .. हमें तांडव करना पडेगा ?

1 comment:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन डॉ. अमरनाथ झा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।