Tuesday, April 7, 2015

जुनून-ए-इश्क ...

'खुदा' जाने किन कांधों पे उठेगा जनाजा उनका
वो जिनसे मिलते हैं तीखी जुबां से मिलते हैं ?
सच ! कुछ ख्याल - कुछ मिजाज, होंगे उनके भी अलग
पर उतने नहीं होंगे 'उदय', जितने हम उनसे अलग हैं ?
… 
कैसा रंज, कैसा गम, औ कैसी शिकायतें
सच ! हम वाकिफ हैं तुम्हारी हरकतों से ?
… 
सच ! मुफलिसी तू छोड़, कुछ और बातें करें
सब जानते हैं, यहीं सब छोड़ के जाना है ??
सच ! जुनून-ए-इश्क में परखच्चे उसके उड़ गए
जिसका नाम था, कल तक, बुलंद इमारतों में ?


1 comment:

Veerendra Vivek said...

Bahut khub likha hai. Kaafi achchi shayri hai aapki hai. Kabhi is naachiz ke blog pe aaya kare.
http://www.vivekv.me/?m=1