Saturday, December 20, 2014

औघड़-फक्कड़ ...

चलो निपट गया
एक……… और कुंभ
कुछेक स्वयम्भुओं …
को पुण्य मिल गया ?

आज, तमाम अपराधी संदेही हैं, या फरार हैं
अब और, ………… हम क्या कहें 'उदय' ?
सच ! न टोपी, न टीका, न माला, न टोटके
हम कैसे मान लें 'उदय', कि तुम ज्ञानी हो ?
....
क़ुबूल हों तुम्हें …
तमगे, दुशाले औ समारोहों की चका-चौंध
हम ! …… हम तो ठहरे औघड़-फक्कड़ ?


1 comment:

Kshitij Ranjan said...

bahut hi khubsurat

padhare .....
www.knightofroyalsociety.blogspot.com