Thursday, May 15, 2014

एग्जिट बनाम एग्जेक्ट ...

कल …
ढंकी ढंकी सी शाम थी,
और आज …
है खुली खुली सुबह … ?

उफ़ ! वो कैसे ज्योतिषी हैं, कैसे पंडित हैं 'उदय'
जिन्हें, अच्छे-औ-बुरे दिनों की समझ नहीं है ?
'खुदा' जाने वो मिट्टी के बने हैं
हार के भी हार मानते नहीं हैं ?
गर, 'एग्जिट पोल', 'एग्जेक्ट' न निकले 'उदय' तो
तो, तो क्या ! डूब मरेंगे बहुत चुल्लु भर पानी में ?
झूठ औ लफ्फाजियों की बुनियाद पे सरकारें
उफ़ ! … कब तक 'उदय' … कब तक ????

2 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (16.05.2014) को "मित्र वही जो बने सहायक " (चर्चा अंक-1614)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

कविता रावत said...

एग्जिट पोल की तो हो गयी बल्ले बल्ले