Tuesday, October 8, 2013

चुनावी दंगल में मंगल की तलाश ?

चुनावी दंगल में मंगल की तलाश ! 

इसमें दोराय नहीं है कि पांच राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों की भी रूप-रेखा तय होगी, पांच राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और मिजोरम में विधानसभा चुनावों की घोषणा होने के साथ ही राजनैतिक पार्टियों में जीत के लिए दंगल शुरू हो गया है, छोटी-बड़ी सभी राजनैतिक पार्टियां हर हाल में दंगल जीतने की जुगत में लग गई हैं। प्रथम दौर में सभी पार्टियां ऐसे मंगलों की तलाश में जुटी हुई हैं जो उन्हें ऐन-केन प्रकरण चुनाव जितवा सकें, यहाँ मंगल से मेरा अभिप्राय ऐसे प्रत्याशियों से है जो चुनाव जिता कर पार्टी का भविष्य मंगलमय कर सकें, अर्थात सभी दल बेहद सदे ढंग से फूंक-फूंक कर आगे बढ़ रहे हैं तथा ऐसे मंगलों अर्थात प्रत्याशियों की तलाश कर रहे हैं जो हर हाल में चुनाव जीत जाएँ तथा चुनावी दंगल को मंगल में बदल दें। विगत कुछेक वर्षों में भ्रष्टाचार व घोटालों को लेकर एक दो नहीं वरन लगभग सभी राजनैतिक दलों की किरकिरी हुई है, जन आन्दोलनों के समय भी लगभग सभी पार्टियों को जनता के आक्रोश का सामना करना पडा है, इस कारण भी सभी दल इस प्रयास में हैं कि प्रत्याशियों के चयन व घोषणा को लेकर पुन: उनकी किरकिरी न हो !

इसी क्रम में पार्टियों के जिला मुख्यालयों, प्रदेश मुख्यालयों व राष्ट्रीय मुख्यालयों पर मंथन का दौर चल पडा है, छोटे-बड़े सभी राजनैतिक दल अपने अपने रणनीतिकारों, सलाहकारों व प्रभावशाली नेताओं के साथ मिल-बैठ कर निरंतर विचार-मंथन कर रहे हैं, किन्तु उन्हें अप-डाउन, यस-नो, यस-यस, नो-नो रूपी कश्मकश के दौर से गुजरना पड़ रहा है। इस कश्मकश की स्पष्ट व मूल वजह विगत दिनों हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'राईट टू रिजेक्ट' व 'सजायाफ्ता प्रतिनिधियों सम्बन्धी' सुनाये गए दो महत्वपूर्ण फैसले हैं, इन दोनों फैसलों के आने के बाद से सभी राजनैतिक दल ऐसे प्रत्याशियों की तलाश में हैं जो उनके लिए मंगल सिद्ध हो सकें अर्थात जो पार्टी की किरकिरी भी न करा सकें और किसी भी तरह से जीत भी दिला सकें। अगर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उपरोक्त दो महत्वपूर्ण फैसले नहीं सुनाये गए होते तो आज सभी राजनैतिक दल अपने अपने पुराने ढर्रों पर चल कर प्रत्याशियों की घोषणा कर निश्चिन्त होकर बैठ गए होते ? खैर, चुनावों का होना भी तय है, और सभी दलों का चुनावी मैदान में उतरना भी तय है, आज नहीं तो कल, कल नहीं तो नामांकन के अंतिम क्षणों तक प्रत्याशियों की घोषणा भी तय है, देर-सबेर तो होते रहती है ! 

लेकिन आज यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा विगत दिनों सुनाये गए 'राईट टू रिजेक्ट' व 'सजायाफ्ता प्रतिनिधियों सम्बन्धी' फैसलों ने राजनैतिक दलों के समीकरणों व मंसूबों पर पानी फेर दिया है, मंसूबों पर पानी फेर देने से मेरा अभिप्राय यह है कि इन आदेशों के लागू होने के पूर्व राजनैतिक दलों के समक्ष बाहुबली व दबंग प्रत्याशियों को भी मैदान में उतारने व जीतने का पूरा पूरा भरोसा रहता था जो अब वे इन आदेशों के लागू होने के बाद ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। साथ ही साथ 'राईट टू रिजेक्ट' रूपी आदेश तो उनके ऊपर तलवार की तरह लटक रहा है जिसके परिणामस्वरूप अब पार्टियां प्रत्याशियों के चयन में तानाशाही भी नहीं कर पा रही हैं, इसके पीछे की वजह भी साफ़ है कि अगर अब वे किसी बाहरी प्रत्याशी को जबरन थोपने का प्रयास करेंगे अर्थात जनभावनाओं की अनदेखी करने का प्रयास करेंगे तब भी उन्हें 'राईट टू रिजेक्ट' के माध्यम से जनता के आक्रोश का सामना करना पडेगा। इन दोनों आदेशों के लागू होने से समस्त राजनैतिक दलों में अंदरुनी हड़कंप मचा हुआ है, अन्दर ही अन्दर सभी दलों को चुनावी दंगल के पूर्व प्रत्याशियों के चयन रूपी दंगल का भी सामना करना पड़ रहा है, आज सभी राजनैतिक दल इस जुगत में हैं कि उन्हें प्रत्याशी रूपी ऐसे मंगल मिल जाएँ जो चुनावी दंगल जितवा सकें ! 

2 comments:

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

बढ़िया लेख | सटीक समीक्षा |

मेरी नई रचना :- मेरी चाहत

प्रवीण पाण्डेय said...

हर चुनाव सबको ही बहुत कुछ सिखा देता है।