Tuesday, February 19, 2013

सरकार ...


उनसे मिलने की, हमें कोई मुकम्मल वजह नहीं दिखती 
फिर भी, न जाने क्यूँ, पग हमारे उनकी ओर बढ़ रहे हैं ? 
... 
हमें तो वे, घुटने से ऊपर, कभी दिखे नहीं हैं 
शायद होंगे, ....................... सरकार हैं ?
... 
तुम इसी तरह, हम पे झूठे इल्जाम लगाते रहो 
गर कोई हमें, भूलना भी चाहे तो भूल न सके ? 

3 comments:

अरुण चन्द्र रॉय said...

badhiya samkalleen

दिनेश पारीक said...

हर शब्द की अपनी पहचान बना दी क्या खूब लिखा है
मेरी नई रचना

प्रेमविरह

एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

Rajendra Kumar said...

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक लिखा है महोदय.