Monday, December 17, 2012

शर्त ...


धुंध छाया है शहर में, बस इक तेरी ही याद का 
गर भूलना चाहूँ तुझे, तो तू बता मैं क्या करूँ ?
... 
बगैर तमाशे के............ शोर 
क्या वजह हो सकती है 'उदय' ? 
... 
उनकी खामोशियों ने 'उदय', हमें शायर तो बना दिया 
मगर अफसोस, दिल........ औ जज्बात नहीं बदले ?
... 
आईना देख-देख के, मत मुस्कुराया करो 
किसी दिन, खुद की नजर न लग जाए ? 
... 
गर कोई शर्त है, तो खुलकर बयां कर दो मेरे यारा 
वैसे भी,... नुक्ताचीनी की हमारी आदत नहीं है ? 

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब, दमदार

Rahul said...

धुंध छाया है शहर में, बस इक तेरी ही याद का
गर भूलना चाहूँ तुझे, तो तू बता मैं क्या करूँ ?

Bahut accha uday ji..