Saturday, May 26, 2012

साहित्य के ज्ञाता ...


देर-सवेर तो सभी को मिट्टी में मिल जाना है 
कहो यारा, फिर आज घमंड किस बात का है ? 
... 
समय के बुरे दौर में, हमने क्या खोया वो तो हम जानते हैं 
पर, क्या पाया है ये तो आने वाला समय ही बताएगा ? 
... 
लो, वो शायरी में कायदा-क़ानून ढूंढ रहे हैं 'उदय' 
उफ़ ! जैंसे एक वही साहित्य के ज्ञाता हों ? 
... 
'खुदा' ने रौशनी उतनी ही दी थी 'उदय', जितने अंधेरे थे 
फिर, आगे का सफ़र तो दिन के उजालों में मुक़र्रर था ! 
... 
गरीब की लंगोटी, औ देश की लुटिया 
ये किन लोगों के हांथों में है 'उदय' ? 

7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सटीक व सन्नाट..

शिवम् मिश्रा said...

बेहद उम्दा ...



इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - माँ की सलाह याद रखना या फिर यह ब्लॉग बुलेटिन पढ़ लेना

jamos jhalla said...

आज का दौर भी क्या अजीब दौर है अन्धेरा अभी भी उजाले पर हावी है
अंधेरों से बचा कर रखे थे हमने बचपन के कुछ सुनहरे सपने
अधेडावस्था में भी आज उजालों को तरसते है अँधेरा अभी भी भारी है
जिस उजाले को तरसता रहा बचपन सारा अधेडावस्था में वोही तड़पन ब़ाकी है

दिलीप said...

seedi baat no bakwas...jabardast

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

sundar abhivyakti !

आशा जोगळेकर said...

वाह वाह ।

ana said...

wah wah wah.....nice post