Thursday, May 17, 2012

सिस्टम ...


परिंदे तक तो महफूज नहीं है तेरे शहर की फिजाओं में
अगर हम ठहरें, तो भला क्यूँ ठहरें ?
...
गर शक है, तुझे मेरी आशिकी पर
तो उठा खंजर, दिल को खुद ही टटोल ले यारा !
...
क्या खूब 'सिस्टम' हुआ है मुल्क में 'उदय'
कहीं सिसकियाँ, तो कहीं शोर है !!

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!