Thursday, May 3, 2012

मर्ज ...


सच ! जी तो चाहता है, किसी दिन, 'हू-ब-हू' तुझे ही पोस्ट कर दूं 
पर, बेहिसाब लाईक-औ-कमेन्ट के डर से, दिल हामी नहीं भरता ! 
... 
तुम भी मीठे, हम भी मीठे, फिर क्यूँ बातें तीखी हों 
आओ, बैठो, लगो गले ... कुछ मीठा-मीठा हो जाए !
... 
सच ! हमारे हरेक मर्ज की दबा, एक तुम हो 
जब तुम सांथ नहीं होते, हाल बेहाल होते हैं ! 

4 comments:

mridula pradhan said...

achchi likhi.....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बहुत खूब। पूरे को एक कविता ही मान रहा हूँ।

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह..जी..वाह