Saturday, April 14, 2012

जी-हुजूरी ...

जिनकी आन के लिए हमने तलवार उठाई थी 'उदय'
गर, वही खामोश हों, तो क़त्ल हम किसका करें ??
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लू की लपटों में भी, हम गाँव में सो जाते थे अक्सर
पर आज, शहर की चांदनी रातें, भी सोने नहीं देतीं !
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साहित्य में 'उदय', क्या जातिगत भेद-भाव की गुंजाईश है ?
शायद नहीं ! पर हाँ, किसे इंकार है बुनियादी जी-हुजूरी से ??

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सबकी दुनिया के अपने अपने रंग..

अरूण साथी said...

wah.....sundar