Saturday, March 3, 2012

तमाशा ...

वक्त के हांथों
हम बन्दर बन गए हैं
खेल उसका, वो मदारी
अब वो ही जाने
ये तमाशा
कब ख़त्म हो पायेगा ?

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

शाश्वत खेल है यह तो..

***Punam*** said...

vishvaas rakhiye....
ek n ek din khatm hi hona hai....

Rahul said...

कभी कभी लगता है वक़्त , समाज ..सब ही मदारी है और हम बन्दर... सत्य बचन