Saturday, February 18, 2012

तेरी आँखों की भाषा ...

तेरी आँखों की भाषा पढ़ते पढ़ते पढ़ नहीं पाए
तुझसे बिछड़ के फिर किसी से मिल नहीं पाए !

बदला कुछ भी नहीं है
सिर्फ वक्त की घड़ियाँ ही बदली हैं !
अभी भी तुम उधर से
खामोश बनकर, मुझसे कुछ कह रहे हो
और कल की तरह ही
हम इधर चुप-चाप तुमको सुन रहे हैं !

सिर्फ दो कदम का फासला था मेरे यारा
उधर से तुम, इधर से हम
जिसे, अब तक, तय कर नहीं पाए !

तेरी आँखों की भाषा पढ़ते पढ़ते पढ़ नहीं पाए
तुझसे बिछड़ के फिर किसी से मिल नहीं पाए !!

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

उस भाषा में कोई व्याकरण सहज नहीं आ पाता है।

संजय भास्कर said...

बहुत खूब!!

बेहतरीन अभिव्यक्ति!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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कल शाम से नेट की समस्या से जूझ रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। अब नेट चला है तो आपके ब्लॉग पर पहुँचा हूँ!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!