Wednesday, February 1, 2012

... वो मेरा क्यूँ है ?

न जीवन की डोर उधर है, न जीवन की डोर इधर
सच ! जिसको देखो, वो कटपुतली-सा नाचे बस है !!
...
कौन जाने, इस जग में, क्या कीमत है उसकी ?
जो जिस दाम, बिक जाए, कीमत है उसकी !!!
...
अब कुछ बचा नहीं है, इसलिए पसरा सन्नाटा है
कहो, क्या ढूँढते हो 'तुम' अब भी इस सन्नाटे में ?
...
अब क्या करूँगा, मैं होकर खुद का
जब तेरा होकर भी, तेरा हो न सका !
...
सच ! न तो मैं उसका, औ न ही वो मेरा है
फिर भी, मैं उसका और वो मेरा क्यूँ है ?

4 comments:

vidya said...

बहुत खूब...

शिवकुमार ( शिवा) said...

बढिया और बेहतरीन ... बधाइयां

shama said...

Yahee sach hai!

प्रवीण पाण्डेय said...

बस यही होता है..