Sunday, November 27, 2011

कब, कैसे, कौन ...

कदम मेरे
उतने तेज नहीं चलते
जितने
शब्द मेरे चल पड़ते हैं !

फिर भी
चलते दोनों हैं
पर चलते
अपनी मर्जी से !

तन थक जाए
कदम रुकें ...
मन थक जाए
शब्द रुकें ...

रुक-रुक के
चलना, बढ़ना
दोनों को
हरदम होता है !

अब देखें
कब, कैसे, कौन
पहुंचता है
एक दूजे से पहले
मंजिल पे ... !!

2 comments:

Archana said...

बिलकुल सच है ये ....पर कड़वा तो नहीं ...

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही प्रभावी।