Friday, November 18, 2011

हवस ...

हवस की आग से
चाहे जैसे भी हो, तुम
बाहर निकल आओ
कहीं ऐंसा न हो
कि -
खुद ही -
जल के ख़ाक हो जाओ !

2 comments:

अशोक बजाज said...

आग का काम ही है खाक करना , अच्छी रचना .

प्रवीण पाण्डेय said...

आग का काम ही है, जलाना।