Thursday, October 27, 2011

सुलगती आग ...

सच ! मुझे न थी खबर
कि -
मेरा अस्तित्व सूखी लकड़ी सा भी है
कभी सोचा भी नहीं था
कि -
जिस दिन जलूँगी, बस जलते रहूँगी
हाँ, याद है वो रात, जब तुमने
कड़कड़ाती ठण्ड में
माचिस की तिली से सुलगाया था मुझे
तिली के स्पर्श ने -
मुझे भभका दिया था
तब से अब तक सुलगी हुईं हूँ
कभी दबे अंगार की तरह
तो कभी भभकती आग की तरह
फर्क होता है तो सिर्फ
तुम्हारे होने, और न होने का
तुम्हारे होने पर -
भभकती
सुलगती
दहकती
आग होती हूँ
और न होने पर दबा अंगार होती हूँ ... !!

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जलने की आस में भीगती लकड़ी।

संगीता पुरी said...

बढिया ..

वन्दना said...

बेहद गहन अभिव्यक्ति।