Tuesday, October 18, 2011

... खरीददार बहुत हैं !!

बहुत हुए, जग में अंधियारे, कब तक इसको-उसको देखें
चलो बनें हम खुद ही दीपक, दीपक बन के जलना सीखें !
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उधर कच्ची, तो इधर पक्की मुहब्बत है
फर्क है तो, सोलह और छब्बीस का है !!
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फेसबुकिया दोस्ती को सलाम है 'उदय'
वो भले न हों, पर हम तो कायल हुए हैं !
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आज चाँद भी आसमां से दो घड़ी को इठलाएगा
तेरी खूबसूरती को देख, मंद मंद मुस्कुराएगा !!
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सच ! आदत सी पड़ गई है, जी हुजूरी की 'उदय'
लोग, दर-ओ-दीवार को भी, ठोक देते हैं सलाम !
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लगता है दोस्त मेरे, मरने की दुआ कर रहे हैं
तब ही तो बात बात पे, मेरी कसम खा रहे हैं !
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कुसूर अपना था जो दिल दे बैठे थे
उन्होंने माँगा कब था !!
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एक अर्से से, जिसे हम मुहब्बत माने बैठे थे
आज तजुर्वा हो गया, मुहब्बत क्या बला है !
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किसी न किसी का तो भ्रम टूटना ही था
चलो अपना सही, समय पर टूट गया !!
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जी चाहे है क्यूं न पुरुस्कारों की दुकां खोली जाए
सच ! दुनिया है बहुत छोटी, खरीददार बहुत हैं !!

3 comments:

संजय भास्कर said...

सच ! दुनिया है बहुत छोटी, खरीददार बहुत हैं !!
.... शानदार प्रस्तुति

संजय भास्कर said...

कई दिनों व्यस्त होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका

महेन्द्र मिश्र said...

जी चाहे है क्यूं न पुरुस्कारों की दुकां खोली जाए
सच ! दुनिया है बहुत छोटी, खरीददार बहुत हैं !!
सटीक रचना ...आभार