Wednesday, October 12, 2011

... जी चाहे है, मुहब्बत कर लें !!

लड़ते लड़ते लड़ जायेंगे, मरने से नहीं घवराएंगे
आज नहीं तो कल, देश की सीरत बदल जायेंगे !
...

पंदौली दे दे, ले ले के, साहित्यिक मंडली बनाई है
तमगों के समय, आपस में ही पीठ थप-थपाई है !
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किसी की मुस्कुराहट, भा गई है हमें
सच ! जी चाहे है, मुहब्बत कर लें !!
...
हम अपने उस्ताद को सलाम करते हैं 'उदय'
उस्तादी ने चेला बन कर जीना सिखाया है !
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सच
! बदलने को तो, रोज बदल रहा है ज़माना
उनका
क्या, जो खुद, खुद को बदलते नहीं है !!
...
इन्टरनेटी दौर में भी लोग छिप के बैठे हैं
'खुदा' जाने, क्यूं पर्दे से बाहर नहीं आते !
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जो जीते रहे, सदा सदा से खुद के लिए
कैंसे मान लें, वो निकले हैं हमारे लिए !
...
जीते जी दौलत समेटने में उलझे हुए थे
एक चुटकी बजी, मौत ने सुलझा दिया !
...
जो व्यवस्था बदलने का दम भर रहे हैं
वो खुद को बदलने से, क्यूं डर रहे हैं !!
...
हमने कसम खा के पानी पी रक्खा है 'उदय'
दाद देंगे तो उसको, जिसके हम पैर छूते हैं !

2 comments:

सागर said...

bhaut hi sundar abhivaykti...

प्रतीक माहेश्वरी said...

जीते जी दौलत समेटने में उलझे हुए थे
एक चुटकी बजी, मौत ने सुलझा दिया !

जो व्यवस्था बदलने का दम भर रहे हैं
वो खुद को बदलने से, क्यूं डर रहे हैं !!

ये सबसे बेहतरीन क्षणिकाएं रही.. मज़ा आ गया..