Tuesday, August 30, 2011

बेरोजगारी के दिन !

बेरोजगार, और बेरोजगारी के दिन
बेरोजगारी के दिनों में
बेरोजगार
कुछ गुमसुम-गुमसुम
कुछ सहमा-सहमा सा रहता है !

जितनी लकीरें उसके चेहरे पे दिखती हैं
उससे कहीं ज्यादा लकीरें
उसके जेहन में बनते-मिटते रहती हैं !

वह, हर पल, हर क्षण
चिंतन, मनन
किसी न किसी गुन्ताड में रहता है
उसका मन, समुद्र की तरह
हर पल, हर क्षण
खलबल-खलबल करते रहता है !

क्यों, क्योंकि
वह एक बेरोजगार होता है
बेरोजगारी का मतलब
पेंट में, शर्ट में, जेब तो होना, पर खाली होना !

उसके, मन में
तरह तरह की इच्छाएं जन्मती हैं
और कुछ पल में ही दम तोड़ते रहती हैं !

होता है अक्सर
ऐसा, बिलकुल ऐसा ही, बेरोजगारी के दिनों में
बेरोजगार, नंगे पांव, हौले-हौले, सहमे-सहमे
इस ओर से उस ओर - उस ओर से इस ओर
चल रहा होता है, बढ़ रहा होता है
किसी चाही - अनचाही, उम्मीद की किरण की ओर !

4 comments:

देवेश प्रताप said...

बेरोजगारी के दर्द को बयाँ करती ये रचना ........सटीक

प्रवीण पाण्डेय said...

यह पीड़ा शारीरिक कम मानसिक अधिक होती है।

अमि'अज़ीम' said...

सच है ...
यकीन न आये तो मुझ से पूछिए...
शब्द बेजोड है ...
साझा करने के लिए धन्यबाद ..

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बेरोजगारी के दिन बहुत तकलीफदेह होते हैं.