Thursday, July 14, 2011

योग्य गुरु की तलाश !

भईय्या प्रणाम ... खुश रहो, आओ अनुज बैठो ... भईय्या मैं आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ ... अरे, इसमें लेने की क्या बात है, मेरा आशीर्वाद तो सदैव ही तेरे सांथ है ... वो तो है भईय्या पर आज मैं आपको अपना "गुरु" बनाना चाहता हूँ ... अरे, तू तो जानता है कि मैं खुद ही किसी "गुरु" की तलाश में हूँ आज तक मुझे ही कोई गुरु नहीं मिल पाया है अर्थात मैं खुद ही किसी का शिष्य नहीं बन पाया हूँ फिर कैसे किसी का "गुरु" बन सकता हूँ "गुरु-शिष्य" बनना, बनाना, सदियों से चली आ रही एक परम्परा है जिसके विधि-विधान हैं, कोई भी, कहीं पर भी, किसी का भी गुरु, किसी का भी शिष्य नहीं बन सकता, फिर तू तो खुद इतना समझदार है ऐसी बिन सिर-पैर की बातें कैसे कर रहा है ... वो सब तो ठीक है भईय्या, पर आज "गुरु पूर्णिमा" हैं पवित्र व अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है आज सुबह मैं "ब्रम्हमुहूर्त" में उठ गया था लगभग दो घंटे यह विचार कर ध्यान-मग्न रहा कि आज मुझे कम से कम एक नेक काम तो जरुर करना है और वो नेक काम "गुरु" बनाना है किन्तु दो घंटे के चिंतन-मनन के बाद भी मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाया कि आखिर किसे अपना "गुरु" बनाया जाए, फिर लगभग ढाई-तीन घंटे घर पर बैठ कर भी गुन्ताड लगाता रहा कि कोई न कोई तो जरुर होगा जो मेरा "गुरु" बन सकता है अर्थात मैं जिसका "शिष्य" बन सकूं, फिर भी मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाया, घंटों की माथा-पच्ची देखते देखते मेरी धर्मपत्नी ने आकर कहा, सुनो जी - तुम्हारा सारा जीवन भईय्या की सलाह-मशवरे पर ही चल रहा है फिर सीधा जाकर भईय्या को ही अपना "गुरु" क्यों नहीं बना लेते ! वैसे तो सालों-साल से मैंने अपनी पत्नी के मुंह से कभी भी "अकलमंदी" की बात नहीं सुनी थी पर आज उसने निसंदेह जबरदस्त "अकलमंदी" की बात कह दी, इसलिए मैं सीधा उठकर आपके पास चला आया, अर्थात आप से अच्छा व श्रेष्ठ "गुरु" मुझे इस जीवन में तो शायद कहीं नहीं मिल सकता, अब आप मुझे अपना "शिष्य" बना लीजिये ताकि मेरा ये जीवन धन्य हो जाए ... देखो अनुज, तुम स्वमेव एक ज्ञानी पुरुष हो, मुझे एक बात बताओ कि क्या कोई भी ज्ञानी पुरुष "गुरु पूर्णिमा" जैसे पवित्र दिन पर किसी "नासमझ" की बातों में आ सकता है ! ... नहीं भईय्या, कतई नहीं आ सकता ... फिर तुम्हारे जैसा विद्धान कैसे किसी "नासमझ" की बातों में आ गया ... मैं समझा नहीं भईय्या ... अरे यार, सीधी सी बात है जैसा तुम कहते हो और कहते रहे हो कि तुम्हारी धर्मपत्नी ने सालों-साल में कभी समझदारी की बात नहीं की है फिर आज उसकी बात पर तुम कैसे यकीन कर सकते हो, वो भी तुम्हारे जैसा ज्ञानी-विद्धानी ... भईय्या लगता है कि आप मुझे टरका रहे हो या फिर उलझा रहे हो ... नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, तू अभी जा, कुछ सोच-विचार कर ले, और कुछेक समझदारों से भी सलाह-मशवरा कर ले कि क्या तेरी धर्मपत्नी "समझदार" है जिसकी बातों पर यकीन किया जा सकता है, अगर वो समझदार निकल गई, तो समझ लेना कि - तुझे "गुरु" मिल गया ... !!

7 comments:

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

गुरु वही जिसका मार्गदर्शन सतत् प्राप्त हो सके। अच्छे-बुरे समय का साथी हो।

गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं

प्रवीण पाण्डेय said...

जो सतत मार्ग दिखाये।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज 15- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
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vidhya said...

आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

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निवेदिता said...
This comment has been removed by the author.
निवेदिता said...

आपका आलेख अच्छा लगा .....
अगर उस नासमझ को गुरु मान लीजिये तो महाकवि मानने का मार्ग प्रशस्त होगा :)

Minakshi Pant said...

सच कहा जो सही राह दिखा दे वही गुरु | बहुत अच्छा दोस्त जी :)