Friday, April 1, 2011

गर्म रातें !!

अब रातें गर्म हो चली हैं
उतनी ही, जितनी
तुम्हारे सांथ होने पर
सर्द रातें, गर्म हुआ करती थीं !

पर उन रातों में, तुम
होती थीं सांथ सांथ
कभी बिछौने की तरह
तो कभी चादर की तरह !

हर दम, हर पल
होती थीं, सांथ सांथ
जहन में सांसों की तरह
दिल में धड़कन की तरह !

पर जब से तुम सांथ नहीं हो
रातें गर्म, गर्म होते चली हैं !!

3 comments:

दर्शन कौर धनोए said...

Bahut sundar !Nice !

वन्दना said...

भावो का सुन्दर समन्वय।

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन।