Friday, April 22, 2011

... बुझते चिराग हैं, जलते हैं रात भर !!

सच ! जब शर्मसार हो ही गए हैं
फिर क्या शर्म, और क्या बेशर्मी !
...
मौक़ा मिला, भौंकने पे आमदा हो गए
कुत्ते की नस्ल है, कुत्ते की जात है !
...
कोई समझाए हमें, ये कैसा शहर है
कोई ज़िंदा, मुर्दा नजर आए !
...
सच ! कोई है जो आज भी दम-ख़म रखता है
वरना भ्रष्ट व्यवस्था में सब भ्रष्टाचारी हुए हैं !
...
भ्रष्टाचारियों का समर्थन, बुद्धिजीवियों की शान हुई
उफ़ ! शायद आन उनकी चंद सिक्कों में बिक गई !
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कोई हमें अपना समझ, आया और ठहर गया
उफ़ ! गर जाए, तो उसे कैसे हम जाने कह दें !
...
बूढों को कोई कूडा-करकट समझे
बुझते चिराग हैं, जलते हैं रात भर !!

4 comments:

honesty project democracy said...

वाह क्या बात है..शानदार उदय जी ...

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह।

शिवकुमार ( शिवा) said...

बहुत सुंदर ..

DABBU MISHRA said...

ये है आपकी बेहतरीन रचनाओं में से एक । इसे संभाल कर रखियेगा ।