Sunday, January 9, 2011

सूखा-सूखा आँचल देखो, खेतों और खलियानों का !

तुम्हें या तुम्हारे ख्यालों को, किस किस को सम्हालें
सब फूल से कोमल हैं, और हम पत्थरनुमा निकले !
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उफ़ ! कडकडाती ठण्ड है, हुई स्वेटर भी बेअसर
पर ! स्वेटर में लिपटी हुई, तेरी यादों की गर्मी है !
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चापलूसी,चमचागिरी,मक्कारी की जन्नत, लाहौलबिलाकुबत
इमानदारी, मेहनत, स्वाभीमान का जहन्नुम, शुभानअल्लाह !
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खुदा
खैर जो तुम आज दिल पे ही बरसे हो
हमें तो लगा, आज सामत नहीं है हमारी !
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काश दिल और जज्बे, हमारे भी कमीने होते
इसी बहाने शायद हम तुम्हारी जुबां पे होते !
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ठंड, गुनगुनाती धुप, और सुबह के मंजर
उफ़ ! तेरे हाथों से उठती 'आदाब' की यादें !
.....
क्या सफ़र, क्या जिन्दगी, क्या राहें
कोई हमें, तेरे गेसुओं से तो निकाले !
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बूँदें, खेती, सावन, भादों, किसान, मजदूर, आसमां
सूखा-सूखा आँचल देखो, खेतों और खलियानों का !
.....
तकलीफें, हौसले, और हम
चलो चलते रहें, बढ़ते रहें !
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कौन ऊंचा, कौन नीचा, सब किताबी आंकड़े हैं 'उदय'
जेब टटोल, सिक्का उछाल कर देखो, सभी बाजार में हैं !
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ताउम्र तेरी गर्म साँसों से, उतना गर्म हुआ ये बदन
जितना आज तेरी चिता की आंच से दहक रहा हूँ मैं !
.....
खुशी हो, या गम का मंजर हो 'उदय'
रोके कहाँ रुकते हैं, छलकते आंसू !
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9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

दमदार शेर, सब बाजार में हैं।

deepak saini said...

तकलीफें, हौसले, और हम
चलो चलते रहें, बढ़ते रहें !

wah wah

रचना दीक्षित said...

अच्छी प्रस्तुति ले कर आये हैं हर शेर इक गहरी बात लिए हुए है

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

har sher kuchh na kuchh kah sakne me saksham.
umda!

अरविन्द जांगिड said...

छलकते कहाँ रुकते हैं.....सच कह दिया आपने.

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब ...शुभकामनायें !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

जीवन की सच्‍चाई को बयां करती सुंदर रचना।

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कादेरी भूत और उसका परिवार।
मासिक धर्म और उससे जुड़ी अवधारणाएं।

अरविन्द जांगिड said...

लघु कथा "तुमने मेरी पत्नी की बेइज्जती की थी" पर आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.-अरविन्द

सुशील बाकलीवाल said...

बेहतरीन प्रस्तुति.