Sunday, November 14, 2010

जूनून-ए-मोहब्बत

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वो कभी छत, तो कभी बालकनी में बैठ बैठ के इम्तिहां ले रहे थे
और हम बे-वजह ही जूनून--मोहब्बत में उनकी गलियों में पास-फ़ैल हो रहे थे !

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5 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हा हा ...क्या बात है ....

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार-परिवार

"अभियान भारतीय" said...

वाह क्या बात है....

Kunwar Kusumesh said...

उफ़ ये इम्तहान भी न
मुसीबत है मुसीबत चाहे कॉलेज के दिनों का हो या मोहब्बत का

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब।