Friday, August 27, 2010

मंदिर-मस्जिद

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मंदिर-मस्जिद तो हम बहुत बना लेंगे
पर दिलों में जगह ईश्वर को हम कब देंगे

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14 comments:

पवन धीमान said...

bahut prasangik sawaal... saadhuvaad.

Majaal said...

मजहब इन दिनों बीमार सा है 'मजाल',
किसी से कह दिया था परहेज कर खुदा से.

शेरघाटी said...

बेहतर !! सुन्दर रचना !

समय हों तो ज़रूर पढ़ें:
पैसे से खलनायकी सफ़र कबाड़ का http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_26.html

शहरोज़

kshama said...

Phir ek baar lajawaab sher!

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Sanjeet Tripathi said...

no doubt, ekdam jabardast!

उठा पटक said...

बहुत बढिया!

Tarkeshwar Giri said...

NICE

डॉ. हरदीप संधु said...

बहुत अच्छा लिखा है....
चलो इस बात को हम यूँ पूरा करते हैं...

जिस दिन ईश्रर को मन में हम जगह देंगे
मन्दर-मस्जित बनाने की जरूरत भी न समझेंगे

संजय भास्कर said...

ekdam jabardast mast

दिगम्बर नासवा said...

बस यही तो आसान नही है उदय जी ....

दिगम्बर नासवा said...

बस यही तो आसान नही है उदय जी ....

दिगम्बर नासवा said...

बस यही तो आसान नही है उदय जी ....

संजय भास्कर said...

बहुत अच्छा लिखा है....